बुलंद सोच।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया है कि आज भारत वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र नहीं रह गया है, क्योंकि जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएं धीरे-धीरे कमजोर होती गई हैं।
मनीष तिवारी ने कहा कि अगर संसद और दूसरी विधायी संस्थाओं को संविधान के मुताबिक अपना काम ठीक से करना है, तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव करने होंगे।
उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि संसद और दूसरी विधायी संस्थाओं का काम कानून बनाना और सरकार को जवाबदेह बनाना है। हालांकि, यदि ये संस्थाएं केवल कार्यपालिका की सत्ता हासिल करने का माध्यम बनकर रह जाएंगी, तो नैतिक, राजनीतिक और सांविधानिक स्तर पर गिरावट लगातार बढ़ती जाएगी।
उनके अनुसार, यह गिरावट 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई थी और तब से लगातार जारी है।
कांग्रेस सांसद ने संसद के कामकाज के आंकड़े भी साझा किए। उन्होंने बताया कि पहली लोकसभा (1952-57) हर साल औसतन 135 दिन बैठती थी। इसके मुकाबले, 17वीं लोकसभा में बैठकें घटकर 55 दिन रह गईं। उनके अनुसार, इन 55 दिनों में भी करीब 30 से 35 दिन हंगामे और व्यवधान की वजह से प्रभावित रहे।
उन्होंने यह भी कहा कि 13वीं, 14वीं, 15वीं और 16वीं लोकसभा का प्रदर्शन भी इससे बहुत बेहतर नहीं था।
मनीष तिवारी ने आशंका जताई कि 18वीं लोकसभा विधायी कामकाज ठप रहने के मामले में पिछली लोकसभा का रिकॉर्ड भी तोड़ सकती है। उनके मुताबिक, अगर यही स्थिति बनी रही तो संसद अपनी सांविधानिक जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से नहीं निभा पाएगी।
कांग्रेस सांसद ने दावा किया कि आज देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का संतुलन कमजोर हो गया है। उन्होंने कहा कि अब व्यवस्था ऐसी बन गई है, जिसमें एक ओर शक्तिशाली कार्यपालिका है और दूसरी ओर न्यायपालिका, जो ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ के बावजूद अपने न्यायाधीशों की नियुक्ति खुद करती है।
मनीष तिवारी ने आगे कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए भारतीय लोकतांत्रिक और सांविधानिक ढांचे की बुनियादी समीक्षा की जानी चाहिए। उनके मुताबिक, संसद और दूसरी विधायी संस्थाओं को उनकी मूल भूमिका में मजबूत किए बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।

