बुलंद सोच, जबलपुर।
हाई कोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी मामलों में बैंक खाते फ्रीज करने की प्रक्रिया पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि विवादित राशि स्पष्ट रूप से चिन्हित हो तो पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना उचित नहीं है।
जांच एजेंसियां यथासंभव केवल संदिग्ध राशि पर लियन या डेबिट फ्रीज लगाएं। पूरे खाते को फ्रीज करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है और उसके लिए कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा।
यह व्यवस्था न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने भोपाल निवासी अर्चना शिवहरे की याचिका पर दी। याचिकाकर्ता नर्मदापुरम में सात कंपोजिट शराब दुकानों की लाइसेंसधारी हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऐश्वर्य साहू ने तर्क दिया कि जांच के लिए केवल विवादित राशि सुरक्षित रखी जाए और शेष राशि के संचालन की अनुमति दी जाए।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि बैंक केवल आदेश का पालन करने वाली संस्था नहीं हैं, बल्कि शिकायत निवारण प्रक्रिया का पहला माध्यम भी हैं।
बैंक खाताधारक को फ्रीजिंग का कारण और उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था की जानकारी देंगे।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि शिकायत सात दिन में पोर्टल पर अपलोड हो, जांच अधिकारी 15 दिन में निर्णय दें और शिकायत स्वीकार होने पर बैंक 48 घंटे के भीतर खाता चालू करें।
राज्य सरकार को आदेश की प्रति सभी बैंकों, पुलिस थानों और साइबर क्राइम इकाइयों को भेजकर पूरे प्रदेश में इन दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
उपभोक्ता कोर्ट का फैसला
जबलपुर उपभोक्ता कोर्ट ने कैंसर के कारण रद्द हुई शादी के मामले में होटल को ₹3.50 लाख लौटाने का राहत भरा फैसला सुनाया है।

