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2026-08-07

सीहोर कृषि महाविद्यालय बनेगा सेरीकल्चर का लाइव लैब

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, ग्वालियर।

राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के आरएके कृषि महाविद्यालय सीहोर ने कृषि शिक्षा को अधिक व्यवहारिक और रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में एक अभिनव पहल की है। महाविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग ने परिसर में शहतूत (मलबरी) के पौधों का रोपण कर रेशम कीट पालन (सेरीकल्चर) के व्यावहारिक प्रशिक्षण की नींव रखी है।

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आने वाले समय में यह परिसर विद्यार्थियों के लिए रेशम उत्पादन की लाइव लैब के रूप में विकसित होगा। यहां विद्यार्थी पूरी उत्पादन प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से सीख सकेंगे।

कीट विज्ञान विभाग के डॉ. नीलेश रायपुरिया ने बताया कि शहतूत की पत्तियां रेशम कीट का प्रमुख आहार होती हैं। पौधों के विकसित होने के बाद महाविद्यालय में ही रेशम कीट पालन, कोकून निर्माण और रेशम उत्पादन की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया जाएगा।

इससे विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि आधुनिक सेरीकल्चर तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी मिलेगा। यह पहल कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी।

सीहोर महाविद्यालय प्रबंधन का कहना है कि यह पहल विद्यार्थियों को शहतूत उत्पादन से लेकर रेशम कीट पालन और कोकून निर्माण तक की संपूर्ण प्रक्रिया को नजदीक से समझने का अवसर प्रदान करेगी। इससे उनकी तकनीकी दक्षता बढ़ेगी।

महाविद्यालय प्रबंधन ने यह भी कहा कि भविष्य में रेशम उत्पादन आधारित स्वरोजगार एवं कृषि उद्यमिता के नए अवसर विकसित होंगे। वर्तमान समय में कृषि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को रोजगार सृजक बनाना भी है।

राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. अरविंद कुमार शुक्ला ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय का यह प्रयास कृषि शिक्षा को प्रयोगात्मक, तकनीकी और रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विद्यार्थी प्रशिक्षण के दौरान ही रेशम उत्पादन की तकनीकों में दक्ष हो जाते हैं, तो वे भविष्य में इस क्षेत्र में सफल उद्यमी बन सकते हैं।

शहतूत के पौधों का रोपण कर शुरू हुई यह पहल आने वाले समय में कृषि महाविद्यालय को सेरीकल्चर प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। इस पहल से छात्र उत्पादन की पूरी श्रृंखला को नजदीक से समझ सकेंगे और कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा।

साथ ही, रेशम उद्योग से जुड़े स्वरोजगार और उद्यमिता के अवसरों के प्रति भी विद्यार्थियों में रुचि विकसित होगी।