बुलंद सोच, इंदौर।

जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश के बाद छात्रसंघ चुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सितंबर माह में सरकारी और निजी कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएंगे। यदि ये चुनाव होते हैं, तो करीब 12 साल बाद एक बार फिर कॉलेज परिसरों में चुनावी माहौल देखने को मिलेगा।
छात्रसंघ चुनावों का इतिहास
प्रदेश में आखिरी बार वर्ष 2016-17 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। इससे पहले, वर्ष 1987 में पूर्ण प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराए गए थे। वर्ष 1988 में हिंसा, तोड़फोड़ और विवादों के बाद प्रत्यक्ष चुनावों पर रोक लगा दी गई थी। वर्ष 1988 से 2003 तक अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव हुए, जिसमें कक्षा प्रतिनिधियों के माध्यम से पदाधिकारी चुने जाते थे।
26 अगस्त 2006 को उज्जैन के एक कॉलेज में हुए हंगामे में प्रो. डॉ. एचएस सबरवाल की मृत्यु के बाद चुनाव पूरी तरह रोक दिए गए थे। वर्ष 2011 में अप्रत्यक्ष चुनाव फिर से शुरू किए गए। इसके एक साल बाद, वर्ष 2012-13 में प्रत्यक्ष रूप से चुनाव हुए, जिसमें वर्षा शर्मा को विश्वविद्यालय अध्यक्ष चुना गया था। फिर वर्ष 2017 में अप्रत्यक्ष चुनाव हुए, लेकिन यूनिवर्सिटी अध्यक्ष की व्यवस्था समाप्त कर दी गई और दक्षिता गढ़वाल को यूटीडी में अध्यक्ष चुना गया।
शासन के निर्देशों का इंतजार
छात्रसंघ चुनाव को लेकर प्रदेश सरकार की ओर से अभी तक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को कोई औपचारिक निर्देश नहीं दिए गए हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थान शासन के आदेश का इंतजार कर रहे हैं। चुनाव की तारीख, प्रक्रिया, मतदान और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है।
छात्र संगठनों की तैयारियां तेज
स्थिति स्पष्ट न होने के बावजूद छात्र संगठनों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले नए विद्यार्थियों से छात्र संगठन संपर्क कर रहे हैं। संगठन नए छात्रों को अपने साथ जोड़ने के लिए सदस्यता अभियान चला रहे हैं।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) भी कॉलेजों में सदस्यता बढ़ाने में लगा है। 13 अगस्त से कॉलेज परिसरों में कैंप लगाकर नए सदस्य बनाए जाएंगे। यह प्रक्रिया 30 अगस्त तक चलेगी। वहीं, एनएसयूआई भी नए विद्यार्थियों से संपर्क कर सदस्यता अभियान चला रहा है। दोनों प्रमुख छात्र संगठनों की गतिविधियां बढ़ने से कॉलेज परिसरों में धीरे-धीरे चुनावी माहौल बनने लगा है।
नए संगठन भी उतरेंगे मैदान में
इस बार छात्रसंघ चुनाव में मुकाबला पहले की तुलना में अधिक दिलचस्प होने की संभावना है। पारंपरिक रूप से सक्रिय एबीवीपी और एनएसयूआई के अलावा कुछ नए छात्र संगठन भी चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। इनमें करणी सेना और जयस की छात्र विंग भी शामिल है। दोनों संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता भी विद्यार्थियों के बीच अपनी पकड़ बनाने और चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं।
छात्र राजनीति का प्रभाव
जीएसीसी, क्रिश्चियन, गुजराती और होलकर साइंस कॉलेज छात्र राजनीति के प्रमुख केंद्र रहे हैं। 1970 और 90 के दशक में इन परिसरों की राजनीति ने कई ऐसे नेताओं को मंच दिया, जिन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआती पारी छात्र राजनीति से ही शुरू की थी। इनमें तुलसी सिलावट, सुरेश मिंडा, पंकज संघवी, सज्जन सिंह वर्मा, विक्रम वर्मा, अश्विनी जोशी, महेंद्र हार्डिया, गोपीकृष्ण नेमा, विपिन वानखेड़े, गौरव रणदीवे और जीतू पटवारी जैसे नेता शामिल हैं।
अधिकारियों और छात्र नेताओं के बयान
डीएवीवी के कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई ने कहा है कि छात्रसंघ चुनाव होने हैं और विश्वविद्यालय इसके लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन अभी गाइडलाइन नहीं आई है। उन्होंने बताया कि शासन की तरफ से निर्देश मिलना बाकी है और विश्वविद्यालय प्रशासन इसका इंतजार कर रहा है।
एबीवीपी के नगर मंत्री देवेंद्र गुर्जर ने बताया कि कॉलेजों में संगठन पहले से सक्रिय है। उन्होंने कहा कि नए सदस्यों को जोड़ने का काम 13 से 30 अगस्त तक किया जाएगा और इस दौरान कक्षा प्रतिनिधि के लिए भी विद्यार्थियों का चयन किया जाएगा।
करणी सेना छात्र विंग के छात्रनेता नितिन ठाकुर ने जानकारी दी कि इस बार छात्रसंघ चुनाव में करणी सेना का छात्र संगठन रहेगा। उन्होंने बताया कि होलकर और जीएससीसी में विद्यार्थियों को संगठन से जोड़ा जा रहा है और चुनाव में छात्र मुद्दों को प्राथमिकता दी जाएगी।
एनएसयूआई के पूर्व विश्वविद्यालय प्रभारी विकास नंदवाना ने बताया कि एनएसयूआई ने छात्रसंघ चुनाव को लेकर कॉलेजों में बैठकें शुरू कर दी हैं। वे प्रत्येक संकाय के विद्यार्थियों से चर्चा कर रहे हैं और नए सदस्य भी बनाए जा रहे हैं।

