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2026-08-14

19 राज्यों के 181 जिलों में 7,500 स्थानों पर भूस्खलन का गंभीर खतरा

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

देश के पहाड़ी और संवेदनशील इलाकों में भूस्खलन का खतरा लगातार गंभीर बना हुआ है। देश के 19 राज्यों के 181 जिलों में लगभग 7,500 ऐसे स्थान चिन्हित किए गए हैं, जहां जमीन खिसकने का खतरा अत्यधिक है।
हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर के राज्य और पश्चिमी घाट भूस्खलन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं। यह खतरा केवल आम आबादी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सड़कों, परिवहन गलियारों, सामरिक अवसंरचना और रक्षा प्रतिष्ठानों पर भी पड़ सकता है।
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 4.3 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को भूस्खलन संभावित क्षेत्र में शामिल किया है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश सहित कई राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में लगातार जमीन खिसकने की घटनाओं का खतरा बना रहता है।
रक्षा भू-सूचना अनुसंधान प्रतिष्ठान इन क्षेत्रों में जोखिम का आकलन कर रहा है और समय पर चेतावनी देने के लिए एक तंत्र विकसित किया गया है।

भूस्खलन के प्रमुख कारण

संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में अंधाधुंध निर्माण को जमीन खिसकने की एक बड़ी वजह माना गया है। पहाड़ों पर सड़कों, इमारतों और अन्य परियोजनाओं के लिए प्राकृतिक ढलानों से छेड़छाड़ होती है, जिससे मिट्टी कमजोर होती है।
पेड़ों की कटाई भी मिट्टी को कमजोर करती है, और बारिश के दौरान यह खतरा और बढ़ जाता है। कई बार पहाड़ का हिस्सा खिसककर सीधे सड़क पर आ जाता है, जबकि कुछ जगहों पर सड़क का हिस्सा ही जमीन के साथ नीचे खिसक जाता है।
इससे यातायात बाधित होने के साथ-साथ लोगों की जान और आवश्यक ढांचे को नुकसान का खतरा बढ़ता है।

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परिवहन और सामरिक ढांचे पर खतरा

आपदा प्रबंधन पर गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की 261वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि भूस्खलन से महत्वपूर्ण अवसंरचना और परिवहन गलियारों को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
इस खतरे से निपटने के लिए हिम सुरक्षा सुरंग, छतनुमा सुरक्षा कवच, रिटेनिंग वॉल, अवरोध बांध और हिमस्खलन अवरोध टीले तैयार किए जा रहे हैं। खासकर पहाड़ी सड़कों पर बरसात के दौरान भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
कई रणनीतिक क्षेत्रों में सड़कें और अन्य सुविधाएं रक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, इसलिए यहां भूस्खलन का असर सामान्य यातायात से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।

संसदीय समिति की सिफारिशें

संसदीय समिति ने संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में अनियंत्रित निर्माण रोकने की सिफारिश की है। समिति ने अति संवेदनशील ढलानों और पर्यटन स्थलों पर निर्माण कार्य सीमित करने के साथ वनों की कटाई रोकने की बात कही है।
समिति ने गहरी जड़ों वाले पौधे लगाने, पहाड़ों पर विकास योजनाओं की समीक्षा करने और भविष्य की परियोजनाओं का भू-तकनीकी तथा पर्यावरणीय आकलन कराने पर जोर दिया है। इसके अतिरिक्त, तय मानकों का पालन और पानी की उचित निकासी की व्यवस्था को भी आवश्यक बताया गया है।

आपदा प्रबंधन बजट में वृद्धि

भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन के बजट में भी बड़ा प्रावधान किया गया है। 2021-22 से 2025-26 के लिए राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि (एनडीआरएफ) के तहत 54,770 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया था।
अब 16वें वित्त आयोग ने आपदा वित्तपोषण के लिए 2,83,807 करोड़ रुपये के कोष की सिफारिश की है। इसमें राज्य स्तरीय निधि के लिए 2,04,401 करोड़ रुपये और राष्ट्रीय स्तर पर 79,406 करोड़ रुपये का प्रस्ताव शामिल है।
इसका मुख्य उद्देश्य आपदा के खतरे वाले इलाकों में तैयारी, राहत और बचाव की क्षमता को मजबूत करना है।