बुलंद सोच, इंदौर।
हेपेटाइटिस को ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि कई बार मरीजों को इसका पता ही नहीं चलता। मरीज वायरस के साथ जीते हैं, लेकिन जब वायरस का लोड बढ़ता है तो लिवर को नुकसान होता है। यदि समय पर जांच में हेपेटाइटिस का पता चल जाए और टीकाकरण व शुरुआती उपचार हो जाए तो इस बीमारी की जटिलताओं को टाला जा सकता है।
भारत में हेपेटाइटिस की स्थिति
चीन के बाद भारत दुनिया में हेपेटाइटिस बी और सी के मामलों में दूसरे स्थान पर आता है। भारत में अनुमानित 3.5 से 4 करोड़ लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के शिकार हैं, जबकि 60 लाख से 1.2 करोड़ लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस सी से पीड़ित हैं। दूषित पानी और भोजन से फैलने वाले संक्रमणों में, हेपेटाइटिस ई भारत में ‘एक्यूट लिवर फेलियर’ का सबसे बड़ा कारण है।
मध्य प्रदेश में ‘साइलेंट किलर’ हेपेटाइटिस का खौफ है, जहाँ प्रदेश का हर 12वां व्यक्ति संक्रमित है। 95% मामलों में शुरुआती लक्षण नहीं दिखते।
इंदौर में उपचार सुविधाएँ
इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में हेपेटाइटिस के उपचार के लिए बनाए गए मॉडल ट्रीटमेंट सेंटर में हर साल हेपेटाइटिस बी के एक हजार और हेपेटाइटिस सी के 300 मरीजों की पहचान हो रही है। इनमें से करीब 50 फीसदी मरीजों को उपचार की जरूरत होती है। यहाँ इंदौर संभाग के सभी जिलों के हेपेटाइटिस के गंभीर मरीज पहुंचते हैं। पीसी सेठी स्थित जिला हेपेटाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर में भी हेपेटाइटिस के मरीजों की जांच, पहचान और उपचार की सुविधा मिल रही है।
इंदौर में सरकारी अस्पतालों में हेपेटाइटिस की जांच और उपचार उपलब्ध है। जिला हेपेटाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर पीसी सेठी अस्पताल में हर गुरुवार को ओपीडी संचालित होती है। मॉडल ट्रीटमेंट सेंटर एमवाय अस्पताल में प्रतिदिन हेपेटाइटिस के गंभीर मरीजों की जांच व उपचार की सुविधा है। महू सिविल अस्पताल में महू और मानपुर के मरीजों को हेपेटाइटिस के वायरल लोड की सैंपलिंग की सुविधा मिल रही है। सांवेर और देपालपुर में ब्लॉक स्तर पर जल्द ही इकाइयाँ तैयार होंगी, जहाँ यह सुविधा उपलब्ध होगी।
जांच और उपचार प्रक्रिया
चिकित्सकों के मुताबिक, जिन मरीजों में हेपेटाइटिस बी व सी की पुष्टि होती है, उन्हें निर्धारित अंतराल पर दवा लेने के साथ पुनः फॉलोअप के साथ टेस्ट करवाना चाहिए। उनमें वायरस के लोड का आकलन किया जाता है और हर छह-छह माह में जांच की जाती है। हेपेटाइटिस बी की बेस लाइन जांच और साल में एक बार वायरल लोड टेस्ट एबीवी डीएनए किया जाता है। हेपेटाइटिस सी के मरीज के टेस्ट में पॉजिटिव आने पर एचसीवी आरएनए किया जाता है। वायरल की संख्या निकलने पर इलाज शुरू होता है और 12 से 24 घंटे तक उपचार चलता है। तीन माह का ब्रेक कर फिर से एचबीवी वायरस टेस्ट किया जाता है।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जिला जेल के कैदियों के लिए एक विशेष स्क्रीनिंग कैंप लगाया गया। इसमें पाँच ऐसे कैदी मिले जो रिहा हो गए हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग का अमला उन्हें खोजकर पुनः जांच करने का प्रयास कर रहा है।
जांच के लिए लक्षित समूह और बचाव
ब्लड बैंक व मरीजों के रक्त के संक्रमण में काम करने वाले कर्मचारी और गर्भवती महिलाओं को हेपेटाइटिस की जांच अवश्य करवानी चाहिए। यदि पीलिया हो, बुखार हो, पेट में दर्द और उल्टियां हों तो ऐसे मामलों में हेपेटाइटिस की जांच करवाएं।
उच्च जोखिम वाले समूहों के सदस्यों की भी जांच की जा रही है, जिनमें सेक्स वर्कर, ट्रांसजेंडर, नशा करने वाले लोग, ट्रक ड्राइवर सहित अन्य लोग शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत टारगेटेड इंटरवेंशन एनजीओ की टीम इन श्रेणियों के लोगों की पहचान कर उनकी हेपेटाइटिस जांच करती है। अप्रैल से जुलाई तक विगत तीन माह में 6500 लोगों की जांच की गई, जिसमें से तीन से चार ही पॉजिटिव मिले। राज्य सरकार द्वारा जल्द ही उच्च जोखिम वाले समूहों के लिए हेपेटाइटिस बी का टीका उपलब्ध करवाया जाएगा और इस समूह के लोगों को यह टीका जल्द लगाया जाएगा।
लोगों में जागरूकता बढ़ने के कारण हेपेटाइटिस के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। डॉ. प्रेशिता द्विवेदी, मेडिकल ऑफिसर, नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल सेंटर, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव पाया जाता है तो उसके परिवार के सभी सदस्यों की हेपेटाइटिस की जांच की जाती है। टैटू लगवाने वाले, ट्रक ड्राइवर, पैथोलॉजिस्ट, नर्स व डॉक्टर जो चिकित्सकीय पेशे में होते हैं, उन्हें बचाव के लिए हेपेटाइटिस बी का टीका जरूर लगवाना चाहिए।

