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2026-08-02

इंसान-हाथी संघर्ष रोकने के लिए केंद्र सरकार की पहल पर राज्यवार मास्टर प्लान तैयार

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

देश के कई राज्यों में जंगल से निकलकर गांवों और खेतों तक पहुंचने वाले हाथियों का झुंड हर साल जान-माल का बड़ा नुकसान करता है। इससे फसलें बर्बाद होती हैं, लोगों में भगदड़ मचती है और कई बार इंसानों व हाथियों दोनों की मौत हो जाती है।
इस समस्या को कम करने के लिए केंद्र सरकार की पहल पर पहली बार इंसान और हाथी के सह-अस्तित्व का राज्यवार मास्टर प्लान तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य गांवों और गजराज दोनों को सुरक्षित रखना तथा हर साल होने वाले जानलेवा संघर्ष को कम करना है। यह नई योजना हर साल होने वाली मौतों को रोकने के लिए बनाई गई है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पहल पर भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने दो वर्षों के अध्ययन के बाद यह विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। 20 से 25 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर बनाई गई यह रिपोर्ट 12 अगस्त के आसपास जारी हो सकती है।
रिपोर्ट का सबसे बड़ा लक्ष्य हर साल औसतन होने वाली करीब 600 लोगों और 120 हाथियों की मौतों को शून्य के करीब लाना है।
अब केवल हादसे के बाद मुआवजा देने के बजाय पहले से ऐसी व्यवस्था बनाने पर जोर रहेगा, जिससे टकराव ही न हो।

संवेदनशील राज्य और आंकड़े

रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल इंसान और हाथियों के संघर्ष के सबसे संवेदनशील राज्य हैं। इन तीन राज्यों में 100 हॉटस्पॉट चिह्नित किए गए हैं।
देश में हाथियों की कुल संख्या लगभग 25 हजार है। सबसे अधिक हाथी दक्षिण भारत में हैं, लेकिन 60 प्रतिशत से ज्यादा संघर्ष पूर्वी भारत में होता है।
वहीं उत्तर भारत में जंगलों में पर्याप्त भोजन और पानी उपलब्ध होने तथा ग्रामीणों के सुरक्षित दूरी बनाए रखने के कारण ऐसे मामले सबसे कम सामने आते हैं। कोयंबटूर स्थित मानव-वन्यजीव संघर्ष उत्कृष्टता केंद्र भी इस दिशा में काम कर रहा है।

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राज्यवार रणनीति और उद्देश्य

रिपोर्ट में पूरे देश के लिए एक जैसी योजना लागू करने के बजाय हर राज्य की जरूरत के अनुसार अलग कार्ययोजना तैयार की गई है। इसमें भौगोलिक परिस्थितियों, हाथियों के पारंपरिक गलियारों, उनके व्यवहार और स्थानीय आबादी के दबाव को ध्यान में रखा गया है।
वैज्ञानिकों ने यह भी अध्ययन किया कि हमले किन कारणों से होते हैं, हाथी अकेला था या झुंड में, घटना किस मौसम और किस समय हुई, मानवीय अतिक्रमण की क्या भूमिका रही और पीड़ितों के लैंगिक आंकड़े क्या रहे। इन सभी पहलुओं के आधार पर स्थानीय स्तर पर रणनीति बनाई गई है।
नई रिपोर्ट का उद्देश्य केवल हाथियों का संरक्षण करना नहीं, बल्कि गांवों और लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करना है। इसके तहत समय रहते टकराव रोकने, हाथियों के पारंपरिक रास्तों को सुरक्षित रखने और संवेदनशील इलाकों में पहले से तैयारी करने पर जोर दिया गया है।
उम्मीद है कि राज्यवार तैयार की गई यह रणनीति इंसान और हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करेगी और दोनों के सुरक्षित सह-अस्तित्व की दिशा में बड़ा कदम साबित होगी।