बुलंद सोच, ग्वालियर।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने लापता युवक को बरामद कर हाई कोर्ट के समक्ष पेश करने की मांग को लेकर दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस को जरूरी जानकारी देने के लिए बाध्य है और जानबूझकर जानकारी छिपाता है, तो उसका यह कृत्य भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ में न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की पीठ ने यह टिप्पणी 11 अगस्त 2026 को राधा प्रजापति की याचिका की सुनवाई के दौरान की।
राज्य सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इस मामले के प्रतिवादी को लापता युवक के ठिकाने की जानकारी है। सरकार ने कोर्ट को अवगत कराया कि युवक प्रतिवादी का पोता है, लेकिन वह पुलिस के साथ सहयोग नहीं कर रहा है।
प्रतिवादी का बचाव
वहीं, प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि याचिका में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया है। उनके अनुसार, प्रतिवादी द्वारा पहले ही गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी और पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उस युवती के बयान भी दर्ज किए हैं, जिसके साथ युवक रह रहा है।
प्रतिवादी की ओर से यह भी कहा गया कि वास्तविक विवाद वैवाहिक प्रकृति का है, जिसे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का रूप दे दिया गया है। हालांकि, प्रतिवादी ने युवक के वर्तमान ठिकाने की जानकारी होने से इनकार किया।
कोर्ट का रुख और पुलिस कार्रवाई
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी को युवक के ठिकाने की जानकारी है या नहीं और वह पुलिस से सहयोग कर रहा है या नहीं, इस पर युवक के बरामद होने के बाद विचार किया जाएगा।
सरकार की ओर से बताया गया कि मिले सुराग के आधार पर पुलिस टीम उस शहर के लिए रवाना हो चुकी है, जहां युवक के होने की जानकारी मिली है। पुलिस को उम्मीद है कि तीन दिन के भीतर युवक को बरामद कर कोर्ट के समक्ष पेश कर दिया जाएगा।
अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त 2026 को होगी।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने एक अन्य सख्त टिप्पणी में कहा कि ‘जो व्यक्ति दशकों तक अपने अधिकारों पर सोया रहे, वह राहत का दावा नहीं कर सकता।’

