बुलंद सोच, ग्वालियर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुरार तहसीलदार द्वारा 31 दिसंबर 2019 को पारित समीक्षा (रिव्यू) आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रभावित पक्ष को नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए बिना समीक्षा की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने यह आदेश राजेंद्र प्रसाद गुप्ता की याचिका पर पारित किया।
यह मामला मुरार के सर्वे नंबर 1862 की भूमि से संबंधित है। वर्ष 2012 में तहसीलदार ने इस भूमि को आबादी भूमि मानकर अतिक्रमण की कार्रवाई समाप्त कर दी थी। इसके बाद 6 मई 2015 को राजस्व अभिलेखों में संशोधन का आदेश भी जारी किया गया था, जिसकी पुष्टि 2018 में संभागायुक्त ने की थी।
इसके बावजूद, राजस्व अधिकारियों ने रिकॉर्ड सुधारने के बजाय पुराने आदेश की समीक्षा कर 2019 में उसे निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि समीक्षा की अनुमति देते समय याचिकाकर्ता को प्रभावी सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जो मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 51 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
अदालत ने यह भी कहा कि तहसीलदार का आदेश कारणों से रहित (नॉन-स्पीकिंग) था और केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर पारित किया गया था। अदालत ने 2019 के आदेश को रद्द करते हुए प्रशासन को कानून के अनुसार नई कार्रवाई करने की छूट दी। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी नई समीक्षा से पहले संबंधित पक्ष को नोटिस देकर सुनवाई का पूरा अवसर देना अनिवार्य होगा।
बीहड़ चरनोई भूमि पर फलदार पौधे लगाने की अनुमति नहीं
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुरैना जिले की सरकारी बीहड़ चरनोई भूमि पर फलदार पौधों का बाग लगाने की अनुमति देने और वहां सीमेंट उद्योग स्थापित करने पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी भूमि पर पौधारोपण की अनुमति तभी दी जा सकती है, जब वह भूमि कानून में निर्धारित श्रेणी में आती हो।
मुरैना निवासी बालकृष्ण शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सर्वे नंबर 1280 की 1.714 हेक्टेयर भूमि पर फलदार वृक्ष लगाने की अनुमति देने और जनहित में वहां सीमेंट उद्योग नहीं लगाए जाने के निर्देश देने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि संबंधित भूमि राजस्व रिकॉर्ड में बीहड़ चरनोई (रवाइन ग्रेजिंग लैंड) के रूप में दर्ज है। इस भूमि का एक हिस्सा जिला व्यापार एवं उद्योग परियोजना के लिए पहले से आरक्षित है। इसलिए इस भूमि पर पौधारोपण की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट के समक्ष यह भी रखा गया कि वर्ष 2018 में कलेक्टर ने आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद अतिरिक्त आयुक्त और फिर राजस्व मंडल (बोर्ड ऑफ रेवेन्यू) ने भी कलेक्टर के फैसले को सही माना था।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने अपने आदेश में कहा कि मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 239(2) के तहत सरकारी भूमि पर फलदार पौधे लगाने की अनुमति केवल उन्हीं श्रेणियों की भूमि पर दी जा सकती है, जिनका कानून में स्पष्ट उल्लेख है। संबंधित भूमि उन श्रेणियों में शामिल नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि जब भूमि स्वयं वैधानिक शर्तों को पूरा नहीं करती, तब न्यायालय कानून के विपरीत अनुमति देने का निर्देश नहीं दे सकता। चूंकि कलेक्टर, अतिरिक्त आयुक्त और राजस्व मंडल तीनों ने नियमों के अनुसार निर्णय लिया है, इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला। इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।
मिड-डे मील समूह को हटाने का आदेश रद्द
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अशोकनगर में मिड-डे मील वितरण का कार्य कर रहे श्रद्धाद स्वयं सहायता समूह को हटाने का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को समूह का अनुबंध समाप्त करने का अधिकार नहीं था।
साथ ही, बिना कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। समूह ने 4 जुलाई 2025 को जनपद पंचायत सीईओ द्वारा जारी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिका में कहा गया कि मिड-डे मील योजना की नीति के अनुसार जांच कर रिपोर्ट भेजने का अधिकार जनपद पंचायत सीईओ को है, जबकि अंतिम निर्णय जिला पंचायत के सीईओ को लेना होता है।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने पाया कि रिकॉर्ड में जिला पंचायत सीईओ द्वारा कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया गया था। इसलिए जनपद पंचायत सीईओ का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
हाईकोर्ट ने आदेश निरस्त करते हुए कहा कि यदि प्रशासन कार्रवाई करना चाहता है तो पहले कारण बताओ नोटिस जारी करे, संबंधित समूह को सुनवाई का पूरा अवसर दे और अंतिम निर्णय सक्षम अधिकारी यानी जिला पंचायत के सीईओ ही लें। इन्हीं निर्देशों के साथ याचिका स्वीकार कर मामले का निराकरण कर दिया गया।
ठेकेदार की देनदारी तय किए बिना वसूली और कुर्की पर सवाल
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक ठेकेदार से की जा रही वसूली और संपत्ति कुर्की की कार्रवाई पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने सीमित प्रश्न पर नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि क्या संबंधित विभाग ने ठेकेदार की देनदारी तय करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया था या नहीं। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।
यह मामला एम/एस संजीव शर्मा की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि विभाग ने 28 जनवरी 2025 को देनदारी तय करते हुए वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी और बाद में कुर्की के आदेश भी जारी कर दिए।
जबकि इससे पहले इसी मामले में वर्ष 2016 में हाईकोर्ट स्पष्ट कर चुका था कि अनिर्धारित हर्जाने की वसूली राजस्व वसूली प्रमाण-पत्र (आरआरसी) के माध्यम से नहीं की जा सकती। अदालत ने उस समय यह भी कहा था कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा देनदारी का विधिवत निर्धारण किए बिना किसी प्रकार की वसूली नहीं की जा सकती।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि विभाग ने उनकी वास्तविक देनदारी का निर्धारण नहीं किया और न ही उन्हें सुनवाई का अवसर दिया। इसके बावजूद सीधे वसूली और कुर्की की कार्रवाई शुरू कर दी गई, जो न्यायसंगत नहीं है।
सुनवाई के दौरान शासन की ओर से उपस्थित सरकारी अधिवक्ता ने जवाब प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा। इस पर न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल सुनवाई केवल इस बिंदु पर होगी कि क्या विभाग ने वसूली से पहले याचिकाकर्ता की देनदारी का विधिवत निर्धारण कर उसे सुनवाई का अवसर दिया था या नहीं। अब मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।
