बुलंद सोच, ग्वालियर।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक विवाहित महिला और उसके लिव-इन पार्टनर द्वारा दायर सुरक्षा संबंधी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वैध विवाह के रहते किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन संबंध को रिट याचिका के माध्यम से न्यायिक मान्यता या संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
याचिका में महिला ने बताया था कि उसका विवाह हो चुका है, लेकिन वह वर्तमान में दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि उन्हें पति और उसके परिजनों से जान का खतरा है, इसलिए पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाएं।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने टिप्पणी की कि यह विवाद मूल रूप से वैवाहिक संबंधों से जुड़ा है, जिसके समाधान के लिए दीवानी और आपराधिक कानूनों में पर्याप्त कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग ऐसे संबंध को अप्रत्यक्ष रूप से वैधता प्रदान करने के लिए नहीं किया जा सकता, जो प्रथम दृष्टया महिला के वैध वैवाहिक संबंध के विपरीत हो।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल जान का खतरा बताकर इस प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती। इसलिए याचिका स्वीकार करने योग्य नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि महिला को अपने वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा, क्रूरता, उत्पीड़न या किसी अन्य कानूनी अधिकार के उल्लंघन की शिकायत है, तो वह सक्षम न्यायालय या संबंधित मंच के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकती है।
