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2026-08-02

लेखक अमीश त्रिपाठी: विरोध प्रदर्शन संवैधानिक दायरे में हों

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, पुणे।

प्रसिद्ध लेखक अमीश त्रिपाठी ने कहा है कि हर पीढ़ी ने अपने समय में आंदोलन किए हैं और आज की जेन-जी भी इससे अलग नहीं है। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी मांगों के लिए विरोध प्रदर्शन करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यह विरोध हमेशा संविधान की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। पुणे के छावनी क्षेत्र स्थित सोलंकी बुकसेलर्स में अपनी नई बाल पुस्तक ‘ध्रुव-तारा: द ग्रेट इंडियन हिस्ट्री क्विज’ के प्रचार के दौरान न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में अमीश ने यह बात कही। अमीश ने बताया कि भारत में सांविधानिक व्यवस्था है और किसी भी बदलाव की मांग उसी व्यवस्था के तहत की जानी चाहिए।

केवल जेन-जी को दोष देना उचित नहीं

लेखक अमीश ने कहा कि हर पीढ़ी ने अपने युवा दिनों में बड़े आंदोलनों का हिस्सा बनकर अपनी आवाज उठाई है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बूमर पीढ़ी के समय नक्सली आंदोलन अपने चरम पर था। इसके बाद जेन एक्स ने मंडल आंदोलन में भाग लिया, जबकि मिलेनियल्स 2011-12 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का हिस्सा बने। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल जेन-जी को विरोध प्रदर्शनों के लिए कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। उनका कहना था कि जब तक आंदोलन असंवैधानिक रास्ते पर नहीं जाता, तब तक विरोध लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।

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डॉ. आंबेडकर के 'ग्रामर ऑफ अनार्की' का जिक्र

अमीश ने डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण ‘ग्रामर ऑफ अनार्की’ का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में संविधान सर्वोच्च है। इसलिए सुधार की मांग भी सांविधानिक प्रक्रिया के जरिए ही की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर युवा प्रदर्शन कर रहे हैं तो उन्हें इसका पूरा अधिकार है, लेकिन यह विरोध संविधान के दायरे से बाहर नहीं जाना चाहिए।

जेन-जी छात्रों के हालिया प्रदर्शन

हाल के दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हजारों जेन-जी छात्रों ने नीट पेपर लीक और अन्य परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन किया था। आंदोलन की प्रमुख मांगों में से एक 25 जुलाई को पूरी हुई, जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दिया।

इतिहास की पढ़ाई से हटे औपनिवेशिक सोच

अमीश ने आगे कहा कि भारतीय इतिहास को पढ़ाने का तरीका बदलने की जरूरत है। उनके अनुसार, आज भी कई स्कूली किताबों में औपनिवेशिक दौर की सोच दिखाई देती है, जिसे बदलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि उनकी नई पुस्तक ‘ध्रुव-तारा: द ग्रेट इंडियन हिस्ट्री क्विज’ बच्चों को भारतीय इतिहास से जुड़े तथ्यों को ‘डिकॉलोनाइज्ड’ यानी औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास करती है।

'70-80% बच्चों को इतिहास लगता है उबाऊ'

अमीश ने दावा किया कि पुस्तक प्रचार के दौरान स्कूलों में बातचीत में 70 से 80 प्रतिशत बच्चों ने माना कि उन्हें इतिहास सबसे उबाऊ विषय लगता है। इसके लिए उन्होंने पढ़ाने के तरीके और पाठ्यपुस्तकों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि इतिहास को रटने वाले विषय के बजाय रोचक कहानियों के माध्यम से पढ़ाया जाना चाहिए। भारत की प्राचीन कथा-वाचन परंपरा से प्रेरणा लेकर बच्चों तक इतिहास को दिलचस्प अंदाज में पहुंचाया जा सकता है।

'ध्रुव-तारा' से इतिहास को बनाया रोचक

अमीश की नई पुस्तक दो 11 वर्षीय बच्चों ध्रुव और तारा की रोमांचक कहानी पर आधारित है। दोनों राष्ट्रीय इतिहास क्विज की तैयारी के दौरान साथ काम करने को मजबूर होते हैं और इसी सफर में भारतीय इतिहास के ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो सामान्य पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलते। लेखक को उम्मीद है कि यह पुस्तक बच्चों में भारतीय इतिहास के प्रति रुचि बढ़ाएगी और उन्हें मनोरंजक तरीके से देश के अतीत से परिचित कराएगी।