बुलंद सोच, ग्वालियर।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दुश्मनी दोधारी हथियार होती है। एक ओर यह किसी को झूठा फंसाने का कारण बन सकती है, वहीं दूसरी ओर यही हत्या जैसे गंभीर अपराध का मजबूत कारण भी हो सकती है। इसलिए केवल पुरानी रंजिश के आधार पर प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही को संदेह की दृष्टि से खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने भिंड के बहुचर्चित अवधेश शर्मा हत्याकांड में चार आरोपितों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए भूरा और कल्लू समेत चारों दोषियों की अपीलें खारिज कर दीं।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल इस कारण किसी गवाह की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि वह मृतक का रिश्तेदार है। यदि उसकी गवाही स्वाभाविक, सुसंगत और अन्य साक्ष्यों से मेल खाने वाली हो तो उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।
अदालत ने यह भी माना कि घटना के महज 30 मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज होना इस बात का मजबूत संकेत है कि मामला मनगढ़ंत नहीं था, बल्कि घटना की तत्काल सूचना पुलिस को दी गई थी। इससे अभियोजन की कहानी को विश्वसनीयता मिलती है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि हत्या में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी या उसकी वैज्ञानिक पुष्टि में कोई कमी रह जाए, तब भी केवल इसी आधार पर प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। जांच एजेंसी की कमियों का लाभ आरोपितों को तब नहीं दिया जा सकता, जब प्रत्यक्षदर्शियों के बयान मेडिकल साक्ष्यों और घटनास्थल से मिले अन्य सबूतों से पूरी तरह मेल खाते हों।
कोर्ट ने आरोपियों की ओर से प्रस्तुत ‘एलिबाई’ (घटना के समय दूसरी जगह मौजूद होने) की दलील भी अस्वीकार कर दी। अदालत ने कहा कि ऐसा बचाव ठोस, स्वतंत्र और निर्विवाद साक्ष्यों से सिद्ध करना आवश्यक होता है, जबकि इस मामले में आरोपी ऐसा करने में पूरी तरह असफल रहे।
इन सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए चारों दोषियों की उम्रकैद की सजा को यथावत रखा।

