बुलंद सोच, इंदौर।

दुष्कर्म पीड़िताओं को अब 24 सप्ताह तक के गर्भ के गर्भपात के लिए न्यायालय की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। यह आदेश मंगलवार को उच्च न्यायालय ने जारी किए।
न्यायमूर्ति संदीप भट्ट की पीठ ने दुष्कर्म पीड़िताओं से जुड़े मामलों में स्पष्ट किया कि यदि गर्भावस्था 24 सप्ताह या उससे कम है, तो गर्भ समाप्त करने के लिए उच्च न्यायालय की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट में निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर संबंधित चिकित्सक और अस्पताल कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई कर सकते हैं।
उच्च न्यायालय ने यह आदेश एक दुष्कर्म पीड़िता बालिका की ओर से प्रस्तुत याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। अधिवक्ता आशीष चौबे ने बताया कि पीड़िता 12 सप्ताह की गर्भवती थी और गर्भ समाप्त कराना चाहती थी।
न्यायालय ने प्रदेश के स्वास्थ्य कमिश्नर को निर्देश दिए हैं कि वे प्रदेश के सभी अस्पतालों में उच्च न्यायालय के इस आदेश की मंशा के अनुरूप व्यवस्था लागू करें।
पूर्व के आदेशों का संदर्भ
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि इस संबंध में पूर्व में उच्च न्यायालय की युगलपीठ द्वारा जारी आदेशों का पालन किया जाए।
उच्च न्यायालय के मंगलवार को जारी आदेश में कहा गया है कि जबलपुर मुख्यपीठ की युगलपीठ ने 20 फरवरी 2025 को एक फैसला दिया था। इस फैसले के अनुसार, दुष्कर्म या यौन हमले की पीड़िता की गर्भावस्था यदि 20 सप्ताह तक है, तो एक पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर की राय पर, और यदि 20 सप्ताह से अधिक लेकिन 24 सप्ताह तक है, तो दो पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर्स की राय के आधार पर गर्भ समापन किया जा सकता है। इसके लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की आवश्यकता नहीं है।
युगलपीठ ने एमटीपी एक्ट की धारा 3 की व्याख्या करते हुए यह भी कहा था कि यदि गर्भावस्था दुष्कर्म के कारण हुई है, तो उससे होने वाली पीड़ा को महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर चोट माना जाएगा।
वहीं, एमटीपी नियम 3-बी में दुष्कर्म, यौन हमला या इन्सेस्ट की पीड़िताओं को 24 सप्ताह तक गर्भ समापन के लिए पात्र श्रेणी में रखा गया है।
सुरक्षित गर्भपात सेवाओं की समीक्षा
मध्य प्रदेश में अब हर छह महीने में सुरक्षित गर्भपात सेवाओं की समीक्षा की जाएगी। दवा और किट की कमी पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई होगी।

