बुलंद सोच, ग्वालियर।

मावा कारोबार अब खुले बाजार से निकलकर दूसरे रास्तों पर जाता दिखाई दे रहा है। शहर की प्रमुख मावा मंडी मोर बाजार में पिछले दो-तीन दिनों से अधिकांश कारोबारियों ने बाहर से मावा मंगाना बंद कर दिया है। जो व्यापारी मावा बुला रहे हैं, वे भी इक्का-दुक्का डलियां ही मंगा रहे हैं। कार्रवाई के दौरान रास्ते में पकड़े जाने से बचने के लिए मावे की डलियों को ढंककर दुकानों तक पहुंचाया जा रहा है। कुछ दुकानदारों ने बाहर से सप्लाई लेने के बजाय घरों से मावा पहुंचाना शुरू कर दिया है। मोर बाजार में पहले रोजाना करीब 200 डलियां यानी 5 हजार किलो मावा पहुंचता था। अब इसकी आवक घटकर महज 30 से 35 डलियां यानी 750 से 875 किलो रह गई है।
आवक में कमी और बढ़ती कीमतें
आवक में भारी गिरावट के चलते शहर की दुकानों पर मावा उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। बाजार में कम फेट वाले मावे के दाम भी 240 से 300 रुपए किलो तक बताए जा रहे हैं। कार्रवाई से बचने के लिए मावे की डलियों को ढंककर दुकानों तक पहुंचाने की बात सामने आई है। कारोबारियों के मुताबिक, रास्ते में खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम द्वारा जांच या धरपकड़ का डर बना रहता है। यही वजह है कि बाहर से मावा मंगाने वाले कई व्यापारियों ने सप्लाई ही रोक दी है। कुछ कारोबारी अब खुले तौर पर दुकान पर मावा रखने के बजाय घर से ग्राहकों तक सप्लाई पहुंचा रहे हैं। इससे मावे के कारोबार की निगरानी और सैंपलिंग को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मोर बाजार में मावे की करीब 40 दुकानें हैं, जहां भिंड-मुरैना के अलावा धौलपुर से भी मावा आता है। लगातार कार्रवाई के कारण दुकानों पर पहले की तरह मावा नजर नहीं आ रहा है। एक व्यापारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि कार्रवाई के डर से कारोबारियों ने मावा मंगाना कम कर दिया है। व्यापारी का कहना है कि जांच और कार्रवाई जरूरी है, लेकिन मानक के अनुरूप कारोबार करने वाले व्यापारियों और मिलावट करने वालों में अंतर किया जाना चाहिए।
गुणवत्ता और मिलावट की आशंका
कारोबारियों के अनुसार, दूध में फेट कम होने के कारण मावा निकलने की मात्रा भी घट गई है। पहले एक किलो दूध से करीब 250 ग्राम मावा निकलता था, जबकि अब यह मात्रा करीब 200 ग्राम रह गई है। मावा कम निकलने के बावजूद बाजार में कम फेट वाले मावे के दाम 240 से 300 रुपए किलो तक बताए जा रहे हैं। इससे उपभोक्ताओं के सामने दोहरी परेशानी खड़ी हो गई है: एक तरफ मावा आसानी से उपलब्ध नहीं है, दूसरी तरफ उपलब्ध मावे की गुणवत्ता और कीमत को लेकर सवाल हैं। मावा कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार, भिंड-मुरैना और ग्वालियर के ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ स्थानों पर मावे की मात्रा बढ़ाने के लिए स्टार्च, आलू, मिल्क पाउडर और वनस्पति घी जैसी सामग्री इस्तेमाल किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसके अलावा शकरकंद, सिंघाड़े का आटा और मैदा मिलाए जाने की भी बात कही जाती है। डॉ. एमएस सागर, अभिहित अधिकारी, खाद्य सुरक्षा प्रशासन, ने बताया कि विभाग की टीम लगातार कार्रवाई कर रही है। मोर बाजार में भिंड से परिवहन कर लाया गया मावा भी पकड़ा जा चुका है, जिसके सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं।

