बुलंद सोच, ग्वालियर।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बहू और उसके बेटे को कथित अवैध बंधन से मुक्त कराने की मांग वाली हैबियस कॉर्पस याचिका को खारिज कर दिया है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि याचिकाकर्ता ने तथ्यों को छिपाते हुए याचिका दायर की है। खंडपीठ के अनुसार, यह मामला अवैध निरुद्धि का नहीं, बल्कि पारिवारिक विवाद का प्रतीत होता है। इसलिए, संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत हैबियस कॉर्पस की असाधारण शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता पहले अपने बेटे नीरज को 75 प्रतिशत मानसिक दिव्यांग बता रहा था। हालांकि, रिकॉर्ड में कई विरोधाभास सामने आए।
कोर्ट ने सवाल किया कि यदि बेटा मानसिक रूप से अस्वस्थ था तो उसकी शादी क्यों कराई गई और वह पिता कैसे बना।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि बड़े बेटे की शादी तय थी, लेकिन उसकी मृत्यु हो जाने के बाद छोटे बेटे नीरज की शादी कराई गई।
इस पर कोर्ट ने पूछा कि यदि नीरज वास्तव में अस्वस्थ था तो विवाह का निर्णय किस आधार पर लिया गया।
बाद में याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि इलाज के बाद नीरज सामान्य हो गया था, इसलिए उसकी शादी हुई और उसके यहां पुत्र का जन्म हुआ। वकील ने आगे कहा कि पत्नी के चले जाने के बाद उसकी मानसिक स्थिति फिर बिगड़ गई।
कोर्ट ने नीरज को भी अपने सामने बुलाया। आदेश में कहा गया कि नीरज स्वयं चलकर न्यायालय के समक्ष आया और पूरे समय उसका व्यवहार सामान्य प्रतीत हुआ।
कोर्ट ने भले ही उसकी मानसिक स्थिति पर अंतिम राय नहीं दी, लेकिन यह जरूर कहा कि उसे देखकर याचिकाकर्ता का दावा प्रथम दृष्टया विश्वसनीय नहीं लगता।
युगलपीठ ने यह भी कहा कि याचिका में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया है और याचिकाकर्ता साफ हाथों से न्यायालय के समक्ष नहीं आया। ऐसे में हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के बेटे नीरज को स्वतंत्रता दी कि वह अपनी पत्नी को साथ रखने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की कार्यवाही शुरू कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, वह बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडी) के लिए सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

