बुलंद सोच, इंदौर।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में तीन आरोपितों को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने 25 वर्षीय आदिवासी युवक के मोबाइल में मिले वाट्सएप मैसेज को प्रथमदृष्टया महत्वपूर्ण “मृत्युपूर्व कथन” माना।
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने धार के विशेष न्यायालय के 27 जुलाई के आदेश को यथावत रखा। उन्होंने न केवल जमानत याचिकाएं खारिज कीं, बल्कि विशेष न्यायालय के विरुद्ध की गई अपील भी निरस्त कर दी।
धार जिले के निवासी संतोष उर्फ लखन औी ने आत्महत्या कर ली थी।
आरोप है कि आरोपित करण जाट, धर्मेंद्र जाट और उमेश जाट ने कृषि भूमि के विवाद में संतोष औी को परेशान किया। उन्होंने उसे गाली-गलौज की, अपमानित किया और जान से मारने की धमकी दी थी।
मृत्यु से पहले, 7 मई को औी ने अपने पिता को वाट्सएप पर तीन मैसेज भेजे थे। अभियोजन पक्ष ने इन वाट्सएप मैसेज को कोर्ट में प्रस्तुत किया, जिन्हें कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
हाई कोर्ट ने कहा कि यह इलेक्ट्रॉनिक सबूत एक महत्वपूर्ण प्रथमदृष्टया “मृत्युपूर्व कथन” है। इन मैसेज में अपीलार्थियों के नाम स्पष्ट रूप से लिए गए हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इसके अलावा, जांच के दौरान दर्ज मृतक के पिता और भाई के बयान अभियोजन पक्ष की कहानी की पुष्टि करते हैं। दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अपीलकर्ताओं ने कृषि भूमि के पुराने विवाद को लेकर मृतक को धमकाया, गाली दी और अपमानित किया। उसे लगातार जान से मारने की धमकियां दी गईं, जिसके कारण कथित तौर पर उसने अपनी जान दे दी।
इधर, आरोपितों की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपितों का औी की आत्महत्या से कोई संबंध नहीं था। उन्हें पुरानी दुश्मनी की वजह से मामले में फंसाया गया था।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि औी ने अपनी मौत से पहले भेजे गए वाट्सएप मैसेज में आरोपितों का नाम लिया था। मृतक के परिवार के करीबी सदस्यों के बयान उसे लगातार परेशान किए जाने की ओर इशारा करते हैं। अपीलार्थियों की ओर से ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिसके आधार पर उन्हें जमानत दी जाए।

