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2026-07-24

केन-बेतवा लिंक परियोजना: पुनर्वास और मुआवजे को लेकर छतरपुर-पन्ना में विरोध जारी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित परिवार लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इन परिवारों का आरोप है कि पुनर्वास, मुआवजा और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में कई खामियां हैं। परियोजना के विरोध में बराना नदी के बीचों-बीच सांकेतिक चिता आंदोलन भी चलाया गया था, जिसे बीते रविवार तड़के पुलिस और प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई कर समाप्त करा दिया। धरना समाप्त कराए जाने के बाद भी कुछ प्रभावित परिवार अलग-अलग जगहों पर सांकेतिक विरोध जारी रखे हुए हैं। प्रभावितों का आरोप है कि उन्हें भूमि अधिग्रहण के बदले उचित मुआवजा नहीं दिया गया है और पुनर्वास की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है। उनकी मांग है कि विस्थापन से पहले उनकी सभी मांगों का समाधान किया जाना चाहिए। इन्हीं मांगों के खिलाफ जल सत्याग्रह, सूली सत्याग्रह और प्रतीकात्मक चिता-आंदोलन जैसे विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में आदिवासी, किसान, महिलाएं और बच्चे शामिल हैं।

राज्य सरकार का रुख और PMO की रिपोर्ट मांग

मध्य प्रदेश सरकार का कहना है कि परियोजना का व्यापक स्तर पर विरोध नहीं हो रहा है। सरकार के अनुसार, विरोध मुख्य रूप से रनझ और मझगवां क्षेत्र के कुछ विस्थापित परिवारों तक सीमित है। सरकार का दावा है कि प्रभावित लोगों को पुनर्वास पैकेज के तहत प्रति व्यक्ति 12.50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है और पुनर्वास की प्रक्रिया नियमों के अनुसार आगे बढ़ रही है। इस विवाद और लगातार जारी आंदोलन को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने राज्य सरकार से पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अब सरकार केंद्र को यह जानकारी भेजेगी कि विरोध किन कारणों से हो रहा है, कितने लोग प्रभावित हैं और पुनर्वास व मुआवजे की प्रक्रिया किस चरण में है।

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केन-बेतवा लिंक परियोजना का परिचय

केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली बेतवा नदी तक पहुंचाना है। इसका लक्ष्य पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों को सिंचाई और पीने का पानी उपलब्ध कराना है। यह परियोजना राष्ट्रीय नदी जोड़ो कार्यक्रम के तहत लागू होने वाली पहली परियोजना है। भारत सरकार ने 1980 में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) तैयार की थी, जिसका मकसद देश की उन नदियों को आपस में जोड़ना है जहां पानी अधिक है, ताकि उस अतिरिक्त पानी को उन क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सके जहां हर साल सूखा और पानी की कमी रहती है।

परियोजना की आवश्यकता

बुंदेलखंड देश के सबसे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता है, जहां बारिश कम और अनियमित होती है। इस क्षेत्र में भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है, और किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर रहते हैं। कई इलाकों में पीने के पानी की भी कमी रहती है, जिससे खेती प्रभावित होती है और लोगों का पलायन भी होता है। सरकार का कहना है कि केन नदी में मानसून के दौरान अतिरिक्त पानी उपलब्ध होता है, जिसे बेतवा बेसिन तक पहुंचाकर पानी की कमी दूर की जा सकती है।

परियोजना के प्रमुख निर्माण कार्य

यह परियोजना दो चरणों में पूरी होगी। पहले चरण में केन नदी पर दौधन बांध, लगभग 221 किलोमीटर लंबी लिंक नहर, करीब दो किलोमीटर लंबी सुरंग और दो जलविद्युत स्टेशन का निर्माण किया जाएगा। यही नहर केन नदी का पानी बेतवा नदी तक ले जाएगी। दूसरे चरण में तीन प्रमुख संरचनाएं बनाई जाएंगी: लोअर ओर बांध, कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स बहुउद्देशीय परियोजना। इनका उद्देश्य बेतवा बेसिन में पानी का बेहतर वितरण करना है।

लागत और पूर्णता का लक्ष्य

केंद्र सरकार ने दिसंबर 2021 में परियोजना को मंजूरी दी थी, जिसकी कुल अनुमानित लागत 44,605 करोड़ रुपये है। इसमें केंद्रीय सहायता के रूप में 39,317 करोड़ रुपये शामिल हैं। परियोजना को आठ वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके निर्माण और निगरानी के लिए एक विशेष संस्था, केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण (KBLPA) का गठन किया गया है।

लाभार्थी राज्य और जिले

सरकार का दावा है कि इस परियोजना से मध्य प्रदेश के पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी, रायसेन जिलों को फायदा होगा। वहीं, उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर, महोबा और बांदा जिलों को भी इस परियोजना से लाभ मिलेंगे।

परियोजना से संभावित लाभ

परियोजना से लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिलेगी, जिसमें मध्य प्रदेश में 8.11 लाख हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 2.51 लाख हेक्टेयर शामिल है। इससे खेती का क्षेत्र बढ़ने और किसानों की आय में सुधार होने की उम्मीद है। लगभग 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा, जिसमें मध्य प्रदेश में 41 लाख और उत्तर प्रदेश में 21 लाख लोग शामिल हैं। परियोजना से 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा, यानी कुल 130 मेगावाट बिजली पैदा होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि इससे खेती बढ़ेगी, रोजगार के अवसर बनेंगे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और बुंदेलखंड से पलायन कम होगा।

परियोजना की वर्तमान स्थिति और भुगतान विवरण

दौधन बांध का निर्माण 6 मार्च 2025 से शुरू हो चुका है और इसे 5 मार्च 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य है। केन-बेतवा लिंक नहर के निर्माण के लिए अलग से टेंडर प्रक्रिया जारी है। परियोजना से कुल 1,913 परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें अनुसूचित जाति के 271, अनुसूचित जनजाति के 648 और अन्य वर्ग के 994 परिवार शामिल हैं। प्रभावित परिवारों को भूमि मुआवजे का 88.25%, संपत्ति मुआवजे का 95.93% और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) पैकेज का 96.69% भुगतान किया जा चुका है। पन्ना जिले में भूमि मुआवजे का 89.58%, संपत्ति मुआवजे का 88.14% और R&R पैकेज का 99.84% भुगतान होने की जानकारी दी गई है। पर्यावरण संरक्षण, पुनर्वास और पारिस्थितिकी संबंधी योजनाओं के लिए 6,303 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है, जिसमें से करीब 5,710 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।

परियोजना के पर्यावरणीय नुकसान के अनुमान

राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट में परियोजना से जुड़े संभावित नुकसान बताए गए हैं। दौधन बांध बनने से पन्ना टाइगर रिजर्व का एक हिस्सा पानी में समा जाएगा, जिससे बाघों और दूसरे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होगा। परियोजना के लिए करीब 6,017 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग होगा, जिससे बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित होंगे और जैव विविधता पर असर पड़ेगा। जंगल का कुछ हिस्सा डूबने और नहर बनने से बाघ, तेंदुआ, गिद्ध और घड़ियाल जैसे वन्यजीवों के आने-जाने के रास्तों पर असर पड़ सकता है। बांध बनने से केन नदी के बहाव में बदलाव आएगा, जिससे नदी की पारिस्थितिकी और जलीय जीवों पर प्रभाव पड़ सकता है, इस पहलू का आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) में भी किया गया है। बांध के बाद निचले इलाकों (डाउनस्ट्रीम) में पानी का प्रवाह बदलने से वहां की खेती, आर्द्रभूमि (वेटलैंड) और नदी पर निर्भर जीव-जंतुओं पर असर पड़ सकता है। बांध और नहर निर्माण के दौरान होने वाले शोर, धूल, भारी मशीनों के उपयोग और मानव गतिविधियों से आसपास का पर्यावरण लंबे समय तक प्रभावित हो सकता है।