बुलंद सोच, इंदौर।
मंगलवार को हाई कोर्ट में शासन यह नहीं बता सका कि बिना योजना के उज्जैन के प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास कार्य कैसे शुरू किए जा रहे हैं।
शासन यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि जब बांड जारी करने के लिए अनुमतियां हासिल नहीं की गई हैं तो फिर बांड कैसे जारी होंगे।
शासन को उज्जैन के धार्मिक स्थलों के विकास के लिए बांड जारी करने की योजना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में जवाब देना था, लेकिन सरकारी वकील ने इसके लिए समय ले लिया। अब इस मामले पर दो सप्ताह बाद फिर सुनवाई होगी।
यह याचिका प्रभात मोहन पांडे ने एडवोकेट रोहित शर्मा के माध्यम से प्रस्तुत की है। एडवोकेट शर्मा ने बताया कि उज्जैन विकास प्राधिकरण (यूडीए) और उज्जैन नगर निगम ने उज्जैन के तीनों प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार एवं नवनिर्माण के लिए टेंडर जारी किए हैं।
इस परियोजना के लिए आवश्यक प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां अभी तक नहीं ली गई हैं।
परियोजना की लागत करीब 300 करोड़ रुपये बताई जा रही है, लेकिन यह राशि न तो यूडीए के पास है और न ही उज्जैन नगर निगम के पास।
यूडीए का कहना है कि बांड जारी कर धन जुटाया जाएगा, लेकिन बांड जारी करने के लिए आवश्यक स्वीकृतियां भी नहीं ली गई हैं।
परियोजना के लिए आवश्यक जमीन का अधिग्रहण भी अब तक नहीं किया गया है।
विकास योजना में शामिल अंगारेश्वर महादेव मंदिर शिप्रा नदी के तट पर स्थित है और यह क्षेत्र मास्टर प्लान के तहत प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है।
कोर्ट ने पिछली सुनवाई पर शासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, मंगलवार को शासन को जवाब देना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका।
मध्य प्रदेश को केंद्र से 688 करोड़ रुपये मिलेंगे, जिससे सिंहस्थ 2028 के लिए उज्जैन में 11 मंदिरों को जोड़कर ‘टेंपल कॉरिडोर’ बनाया जाएगा।
