बुलंद सोच, भोपाल।
राजधानी भोपाल के रिहायशी इलाकों में बिना अनुमति धड़ल्ले से चल रही व्यावसायिक गतिविधियों पर सर्वोच्च न्यायालय ने पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है। आवासीय भूखंडों पर अवैध व्यावसायिक निर्माण और नियमों के उल्लंघन पर कड़ा संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने यह निर्णय सुनाया है।
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री स्तर पर गठित 10 सदस्यीय समीक्षा समिति को भंग कर दिया। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दुकान संचालकों को दी गई राहत (स्टे ऑर्डर) को भी निरस्त कर दिया गया।
शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में साफ कर दिया कि जब मामले की सीधी निगरानी सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, तो इसके समानांतर कोई अन्य जांच या सरकारी राहत समिति बनाकर कार्रवाई को प्रभावित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने इस मामले में कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल
वहीं, अमेकस क्यूरी अधिवक्ता एके सिन्हा ने न्यायालय को बताया कि नगर निगम द्वारा बंद करवाए गए व्यावसायिक प्रतिष्ठान पुनः खोल दिए गए हैं।
सुनवाई के दौरान नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उस समय सवाल खड़े हो गए, जब उसकी रिपोर्ट में भारी हेरफेर सामने आया। निगम ने कागजों में 100 दुकानों को सील करने का दावा किया था, जबकि हकीकत यह थी कि महज दो दुकानों पर ही ताले लगाए गए थे।
निगम ने एक हजार दुकान संचालकों को नोटिस देने की दलील रखी। इस पर अदालत ने मध्य प्रदेश शासन के अधिवक्ता को फटकार लगाई।
जब निगम की ओर से हाथ बंधे होने और कार्रवाई न कर पाने की लाचारी जताई गई, तो कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा नहीं चलेगा और कानून का पालन कराने में कोई भी ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी।
पीठ ने भोपाल नगर निगम को पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सुधारने के लिए पांच सप्ताह का समय दिया है। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
जनता और व्यापारियों की प्रतिक्रिया
कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर और बावड़ियाकलां जैसे इलाकों के रहवासियों में खुशी की लहर है। संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के बैनर तले लंबे समय से आंदोलन कर रहे नागरिकों का कहना है कि आवासीय क्षेत्रों में दुकानें और दफ्तर खुलने से ट्रैफिक जाम, पार्किंग संकट और सुरक्षा संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही थीं।
दूसरी ओर, व्यापारी महासंघ ने इस संकट के लिए प्रशासनिक विफलता को जिम्मेदार ठहराया है। व्यापारियों का तर्क है कि बीते 21 सालों से शहर का मास्टर प्लान लागू नहीं हो सका, जिसके चलते व्यावसायिक भूखंड उपलब्ध नहीं हुए और मजबूरी में आवासीय परिसरों से व्यापार चलाना पड़ा।
नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन ने कहा कि नगर निगम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पूरी तरह पालन करेगा और नियमानुसार ही आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
10 नंबर व्यापारी महासंघ के अध्यक्ष आनंद सोनी ने कहा कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हमारा पक्ष ठीक से प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार यह तथ्य मजबूती से रखती कि भोपाल में बीते 21 वर्षों से मास्टर प्लान लागू नहीं हुआ है, तो हमें राहत और समय अवश्य मिलता। सोनी का यह भी कहना था कि सरकार को सख्त कार्रवाई से पहले गुजरात मॉडल या नया मास्टर प्लान लागू करना चाहिए।
याचिकाकर्ता पूर्णेंदु शुक्ला ने बताया कि इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त है और कोर्ट ने रहवासी क्षेत्र में व्यावसायिक ठिकाने हटाने की दिशा में आगे बात बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि यह तय हो गया है कि रिहायशी क्षेत्र में कमर्शियल गतिविधियां नहीं होंगी।
अरेरा कॉलोनी के रहवासी विवेक त्रिपाठी ने भी बताया कि रहवासियों में खुशी की लहर है। उन्होंने कहा कि सुनवाई में नगर निगम ने अपनी झूठी रिपोर्ट दी, जिसमें दो दुकानों को सील किया गया था जबकि 100 को सील करने की जानकारी दी गई थी, जिस पर उनको फटकार पड़ी।

