बुलंद सोच, ग्वालियर।

ग्वालियर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सौतेला बेटा भी किराएदारी कानून के तहत बेटे की श्रेणी में आता है। यदि उसके कारोबार के लिए दुकान की वास्तविक जरूरत है, तो मां अपनी संपत्ति पर काबिज किराएदार से दुकान खाली करा सकती है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने करीब 21 साल पुराने किराएदारी विवाद में यह निर्णय सुनाया। जस्टिस आशीष श्रोती ने द्वितीय अपील स्वीकार करते हुए निचली अपीलीय अदालत के उस निर्णय को निरस्त कर दिया, जिसमें सौतेले बेटे की कारोबारी जरूरत के आधार पर दुकान खाली कराने से इनकार किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गुना की मटकरी कॉलोनी स्थित ‘आनंद भवन’ की एक दुकान से जुड़ा है। यह दुकान वर्ष 1972 में आनंद राव मटकरी ने किराए पर दी थी। आनंद राव मटकरी के निधन के बाद पारिवारिक बंटवारे में यह दुकान उनकी बेटी विजया के हिस्से में आई। विजया ने अपने बेटे आशुतोष के कारोबार के लिए दुकान की जरूरत बताते हुए किराएदार से दुकान खाली कराने का मुकदमा दायर किया था। आशुतोष, विजया के पति आनंद कुमार की पहली पत्नी आरती का बेटा है। आरती का वर्ष 1992 में निधन हो गया था। इसके अगले वर्ष 1993 में आनंद कुमार ने विजया से विवाह किया था। विजया और आनंद कुमार की अपनी कोई संतान नहीं है।
न्यायिक प्रक्रिया
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने विजया के पक्ष में फैसला सुनाया था और किराएदार को दुकान खाली करने का आदेश दिया था। हालांकि, निचली अपीलीय अदालत ने इस निर्णय को पलट दिया। उसका मानना था कि सौतेले बेटे की कारोबारी जरूरत को आधार बनाकर किराएदार से दुकान खाली नहीं कराई जा सकती।
हाई कोर्ट का तर्क और अंतिम निर्णय
इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत के निष्कर्ष को सही नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि यदि किराएदारी कानून के तहत ‘फॉस्टर सन’ यानी पालन-पोषण किए गए बेटे को भी बेटे के रूप में माना जा सकता है, तो सौतेले बेटे को इससे अलग रखने का कोई उचित आधार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस वजह से आशुतोष को मां की कोख से जन्मा बेटा नहीं माना जा सकता, उसकी कारोबारी जरूरत को खारिज नहीं किया जा सकता। उसकी जरूरत को कानून के तहत बेटे की जरूरत के रूप में देखा जा सकता है। किराएदार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि भवन की पहली मंजिल पर दूसरी जगह उपलब्ध है, इसलिए ग्राउंड फ्लोर की दुकान खाली कराने की जरूरत नहीं है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि कारोबारी गतिविधियों के लिए पहली मंजिल की जगह को ग्राउंड फ्लोर की दुकान का समान विकल्प नहीं माना जा सकता। दुकान की प्रकृति, स्थान और कारोबार की जरूरत को देखते हुए मालिक की वास्तविक आवश्यकता का आकलन किया जाना चाहिए। इन्हीं आधारों पर हाई कोर्ट ने द्वितीय अपील स्वीकार करते हुए निचली अपीलीय अदालत का फैसला पलट दिया और विजया के पक्ष में पहले से हुई बेदखली की डिक्री को बहाल कर दिया।

