बुलंद सोच, झाबुआ।
प्रदेश में महिला सशक्तिकरण का स्वरूप अब केवल सामाजिक कल्याण या आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रह गया है। सरकार स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की महिलाओं को गांवों की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
झाबुआ के थांदला में आयोजित स्वयं सहायता समूहों के क्षमतावर्धन एवं ऋण वितरण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संबोधित किया। उनके संबोधन से यह स्पष्ट संकेत मिला कि सरकार महिलाओं को सिर्फ योजनाओं की हितग्राही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संचालक के रूप में स्थापित करना चाहती है।
इस कार्यक्रम में 300 करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया। इसके साथ ही, महिलाओं की भूमिका को कृषि, पशुपालन, बैंकिंग, उद्यमिता और सरकारी सेवाओं से जोड़ने की रणनीति भी सामने आई।
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि अगले वर्ष से सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की सिली हुई यूनिफॉर्म स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा तैयार कराई जाएगी। इसे ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थायी आय और सरकारी खरीद प्रणाली से जुड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
स्वयं सहायता समूहों की नई भूमिकाएं
प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अब कृषि सखी, बैंक सखी, ड्रोन दीदी, पशुपालन दीदी और उद्यम सखी जैसी बहुआयामी भूमिकाओं में कार्य कर रही हैं।
सरकार का उद्देश्य गांवों में ऐसा महिला नेटवर्क तैयार करना है, जो खेती से लेकर वित्तीय सेवाओं और छोटे उद्यमों तक स्थानीय स्तर पर सेवाएं उपलब्ध करा सके।
स्थानीय रोजगार और बाजार पर जोर
सरकार का ध्यान केवल ऋण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। दीदी कैफे, आजीविका पुस्तकालय, महिला किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और सरकारी यूनिफॉर्म सिलाई जैसे कार्यों के माध्यम से महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और नियमित बाजार तैयार करने की रणनीति अपनाई जा रही है।
इस रणनीति से विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन कम करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
प्रमुख आंकड़े
स्वयं सहायता समूहों को कुल 300 करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया।
प्रदेश में 64 हजार से अधिक लखपति दीदी सक्रिय हैं।
महिलाओं द्वारा 196 दीदी कैफे संचालित किए जा रहे हैं।
स्वयं सहायता समूहों के संचालन में 85 आजीविका पुस्तकालय शामिल हैं।
महिला किसान उत्पादक संगठनों ने 958 करोड़ रुपये का कारोबार किया है।

